(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.223. अध्यायः 223
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रति जनकोपाख्यानकथनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

`* युधिष्ठिर उवाच। 12-223-0x(6105)(74090)
किं कारणं महाप्राज्ञ दह्यमानश्च मैथिलः।
मिथिलां नेह धर्मात्मा प्राह वीक्ष्य विदाहिताम्॥ 12-223-1(74091)
भीष्म उवाच। 12-223-2x(6106)
श्रृयतां नृपशार्दूल यदर्थं दीपिता पुरा।
वह्निना दीपिता सा तु तन्मे शृणु महामते॥ 12-223-2(74092)
जनको जनदेवस्तु कर्माण्याध्याय चात्मनि।
सर्वभावमनुप्राप्य भावेन विचचार सः॥ 12-223-3(74093)
यजन्ददंस्तथा जुह्वन्पालयन्पृथिवीमिमाम्।
अध्यात्मविन्महाप्राज्ञस्तन्मयत्वेन निष्ठितः॥ 12-223-4(74094)
स तस्य हृदि संकल्पं ज्ञातुमैच्छत्स्वयं प्रभुः।
सर्वलोकाधिपस्तत्र द्विजरूपेण संयुतः॥ 12-223-5(74095)
मिथिलायां महाबुद्धिर्व्यलीकं किंचिदाचरन्।
स गृहीत्वा द्विजश्रेष्ठैर्नृपाय प्रतिवेदितः॥ 12-223-6(74096)
अपराधं समुद्दिश्य तं राजा प्रत्यभाषत।
न त्वां ब्राह्मण दण्डेन नियोक्ष्यामि कथंचन॥ 12-223-7(74097)
मम राज्याद्विनिर्गच्छ यावत्सीमा भुवो मम।
तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणो गत्वा राजानं प्रत्युवाच ह॥ 12-223-8(74098)
करिष्ये वचनं राजन्ब्रवीहि मम जानतः।
का सीमा तव भूमेस्तु ब्रूहि धर्मं ममाद्य वै॥ 12-223-9(74099)
तच्छ्रुत्वा मैथिलो राजा लज्जयावनताननः।
नोवाच वचनं विप्रं तत्वबुद्ध्या समीक्ष्य तत्॥ 12-223-10(74100)
पुनःपुनश्च तं विप्रश्चोदयामास सत्वरम्।
ब्रूहि राजेन्द्र गच्छामि तव राज्या द्विवासितः॥ 12-223-11(74101)
ततो नृपो विचार्यैवमाह ब्राह्मणपुङ्गवम्।
आवासो वा न मेऽस्त्यत्र सर्वा वा पृथिवी मम।
गच्छ वा तिष्ठ वा ब्रह्मन्निति मे निश्चिता मतिः॥ 12-223-12(74102)
इत्युक्तः स तथा तेन मैथिलेन द्विजोत्तमः।
अब्रवीत्तं महात्मानं राजानं मन्त्रिभिर्वृतम्॥ 12-223-13(74103)
त्वमेवं पद्मनाभस्य नित्यं पक्षपदाहितः।
अहो सिद्धार्थरूपोऽसि गमिष्ये स्वस्ति तेऽस्तु वै॥ 12-223-14(74104)
इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रस्तज्जिज्ञासुर्द्विजोत्तमान्।
अदहच्चाग्निना तस्य मिथिलां भगवान्स्वयम्॥ 12-223-15(74105)
प्रदीप्यमानां मिथिलां दृष्ट्वा राजा न कम्पितः।
जनैः स परिपृष्टस्तु वाक्यमेतदुवाच ह॥ 12-223-16(74106)
अनन्तं वत मे वित्तं भाव्यं मे नास्ति किंचन।
मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे किंचन दह्यते॥ 12-223-17(74107)
तदस्य भाषमाणस्य श्रुत्वा श्रुत्वा हृदि स्थितम्।
पुनः संजीवयामास मिथिलां तां द्विजोत्तमः॥ 12-223-18(74108)
आत्मानं दर्शयामास वरं चास्नै दद्रौ पुनः।
धर्मे तिष्ठस्व सद्भावो बुद्धिस्तेऽर्थे नराधिप॥ 12-223-19(74109)
सत्ये तिष्ठस्व निर्विण्णः स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम्।
इत्युक्त्वा भगवांश्चैनं तत्रैवान्तरधीयत।
एतत्ते कथितं राजन्किं भूयः श्रोतुमिच्छसि॥' ॥ 12-223-20(74110)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ 223॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

* 223, 223 एतदध्यायद्वयं ध. पुस्तकएव दृश्यते।


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